मुनी आगस्त्य के शिष्य सुतिक्ष्ण
मुनि अगस्त्य जी के एक शिष्य का नाम सुतिक्ष्ण था वे बहुत ही ज्ञानी थे, भगवान राम के परम सेवक थे, वे कभी किसी और भगवान के बारे में कभी सोचते भी नहीं थे, उन्होंने ज्यो ही सूना प्रभु श्री राम उनके यहाँ आ रहे है वे ख़ुशी के मारे दौड़ चले, उन्हें खुशी के मारे दिशाओं का भी ज्ञान नहीं रहा वे सिर्फ दौड़े ही जा रहे है, वे कभी आगे जाते है तो कभी पीछे कभी दाए तो कभी बाए पूर्ण रूप से प्रभु के प्रेम में लींन होकर वे क्या कर रहे है उन्हें कुछ नहीं सूझता है, वे रास्ते में प्रभु का गुण गाते जा रहे है, और गाते हुए नाचना आम बात हो गयी है, मुनी प्रभु के प्यार में पागल हो गए है वे रास्ते में बस प्रभु को ही याद कर रहे है, उनकी यह सब दसा प्रभु एक पेड़ के पीछे छिप के देखते है, मुनी प्रेम के मारे वही बैठ जाते है और श्री राम के बारे में सोचने लगते है तब उनके हृदय में प्रभु राम दर्शन देते है I
तब श्री राम उनके पास आये और उनकी यह दशा देखकर बहुत खुश हुए, अब प्रभु श्री राम उन्हें जगाने की कोशिश करने लगे पर व्यर्थ जाने लगा क्योकि प्रभु तो उनके ह्रदय में बसे हुए थे और प्रभु में लीं थे, तब प्रभु ने अपनी रूप को उनके ह्रदय से हटा लिया प्रभु के गायब होते ही मुनि ऐसे व्याकुल होकर उठे जैसे सांप अपने मणी के बिना ब्याकुल हो जाता है, पर जब वे जगे तो उन्हें उनके सामने श्री राम माता सीता के साथ लक्ष्मण जी को देखकर वे उठे और पागल की तरह श्री राम के चरणों में जा गिरे, प्रभु ने उन्हें अपने विशाल भुजाओ से उठाया और गले लगा लिया, तब मुनि ने हदय को संत करके प्रभु के चरणों को बार बार स्पर्श करना सुरु किया फिर प्रभु को अपने आश्रम में लाकर उनकी अनेको प्रकार से पूजा की मुनि कहते है की प्रभु आप ही बताये मई आपके कैसे विनती करू क्योकि आपकी बुद्धि तो अपर है और मेरी बुद्धि तो अल्प है, मुनि कहते है आप तो निरमल, व्यापक, अविनासी और सबके ह्रदय में रहने वाले है हे प्रभु आप सीता जी और लक्ष्मण जी के साथ इसी वन में विचरने वाले रूप में ही आप मेरे ह्रदय में निवास करे I
तब श्री राम अति प्रसन होकर मुनि को अपने ह्रदय से लगा लेते है और कहते है की हे मुनि आप मुझे खुश जाने और आप वर मांगे, यह सुन कर मुनि बोले हे प्रभु मैं क्या वर मांगु मुझे तो समझ नहीं आता हे दसो के रखवाले आपको जो अच्छा लगे आप वही दे I
तब भगवान के कहा तुम प्रगाढ़ भक्ति, वैराग्य, और समस्त गुणों तथा ज्ञान के नीधान हो जाओ, तब मुनि ने कहा के प्रभु नो अच्छा लगा उन्होंने दिया अब जो मुझे लगत है प्रभु वह दीजिये, मुनि के कहा हे प्रभु आप माता सीता सहित सहित लक्ष्मण जी साथ स्थिर होकर मेरे मन में निवास करे, तब प्रभु ने ऐसा ही हो कहकर आशीर्वाद और मुनि अगस्त्य के यहाँ मिलने चले, तब मुनि सुतिक्ष्ण ने कहा की मुझे अगस्त्य ऋषि का दर्शन किये हुए बहुत दिन हो गए है अब मई भी आपके साथ चलता हु इसमें हे नाथ आप परमेरे कोई एहसान नहीं होगा, मिनी चतुरता देखकर दोनों भाई हँसने लगे और कृपा के भंडार श्री राम ने उन्हें साथ ले लिया I
रास्ता कब ख़त्म हुआ पता ही नहीं चला और मुनि अगस्त्य का कुटिया आ पंहुचा मुनि सुतिक्ष्ण ने जाकर अपने गुरु अगस्तय जी से बताया की श्री राम आ रहे है, यह सुनते ही मुनि अगस्त्य दौड़ कर श्री राम से मिलने जा पहुंचे, श्री राम को देखते ही उनके आँखो से प्रेम के आसु निकलने लगे मुनि तुरंत श्री राम और लक्ष्मण मुनि के चरणों में जा गिरे ऋषि ने उन्हें अपने गले से लगा लिया मुनि ने उन्हें आदर पुरवक आसन पर बैठाया और कहने लगे की आज मेरे जैसा और कोई भाग्यशाली नही श्री राम सब मुनियों के समूह की और मुंह करके बैठे और कहंने लगे, हे मुनिगण आपसब तो सब कुछ जानते ही है की मई किसलिए यहाँ आया हु, अब आप सब मुझे वही मंत्र दे जिससे मई उन राक्षसों का संहार कर पाउ, यह सुनते ही मुनि मुस्कुराए और बोले हे नाथ आपने क्या समझकर यह प्रश्न किया, हे पापो का नास करने वाले राम मई आपकी भक्ति करके आपके बारे में कुछ जनता हु, आपकी माया तो सब से पर है , हे प्रभु आप सम्पूर्ण लोको के मालिक है, और मुझसे इस प्रकार प्रश्न कर रहे है प्रभु आप हमेशा ही अपने भक्तो की बडाई करते है इसीलिए अपने यह प्रश्न किया है मुझसे, हे सुनिए मई आपको बताता हु I
मुनि ने कहा दण्डक वन में पंचवटी नामक स्थान है वह स्थान मुनि गौतम के श्राप से ग्रसित है हे श्री राम आप वहा जाकर निवास कीजिये और मुनि के कठोर श्राप को हर लीजये, मुनि का आज्ञा पाकर श्री राम वहा से मुनि का आज्ञा पाकर आगे चले और तुरंत पंचवटी जा पहुंचे I
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